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कितना फर्क पड़ता है इस दौर के आंदोलन से .........

''आंदोलन ''शब्द का परिभाषा खोजने और जाने की इच्छा हुई ,फिर भारतके अंदर हो रहे है ,आंदोलन को समझने की कोशिश किया। मै जो समझ सका वो यह है कि जब भी समाज के अंदर शोषण और अन्याय होता है और इसके खिलाफ में संगठित रूप से लोगो के द्वारा उठाये गए आवाज़ को ''आंदोलन ''कहते है। लेकिन उस आंदोलन  किस  एक  वयक्ति विशेष  को ही लाभ  मिल पता है। शायद यही कारण आज के माजूदा सरकार  को किसी भी आंदोलन से कोई फर्क नहीं पड़ता। 


पिछले कुछ वर्षो  से जो भारत में आंदोलन हुए है ,जो है -


१.
भारत स्वाभिमान आन्दोलन -2011-
‘भारत स्वाभिमान आन्दोलन’ कालेधन के विरुद्ध खड़ा किया गया एक विशाल जनांदोलन था जिसकी अगुवाई बाबा रामदेव ने किया था। लेकिन उस समय कांग्रेस की सर्कार थी।  कांग्रेसी सरकार ने पुलिस बल द्वारा इसे जबरन तुडवा दिया।

२.जनलोकपाल बिल – एंटी करप्शन आन्दोलन -2011-साल 2011 में ही प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने दिल्ली के जंतर मंतर पर जनलोकपाल बिल के लिए भूख हड़ताल शुरू की, जिसके समर्थन में पूरा देश एकजुट हुआ | इसी आन्दोलन की बदौलत अरविन्द केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमन्त्री बने |
३ निर्भया आन्दोलन – 2012-साल 2012 में दिल्ली में हुए एक गैंगरेप के बाद इस देश ने अपने नागरिको का एक ऐसा गुस्सा देखा जो महिलायों पर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध था, इससे एक स्फूर्त आन्दोलन खड़ा हुआ जिसे निर्भय आन्दोलन कहा गया |लेकिन आज भी वही हलात है। 



अब हम सभी को पता है ,इन आंदोलन से किसका विकास  हुआ ,कितना  हमारा समाज सुधारा  है। जररूत है आज के दौर में अपने मानसिकता का  सुधारने का ,तब जाकर हमे सही गलत के समझ आएगा। 





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