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संदेश

सोशल मीडिया का प्रभाव

पहले  , जब आप अपनी कोई बात कहते थे ,तो एक परिवार ,दोस्त , स्कूल ,कॉलेज या आपके कार्यरत सस्था तक ही रहता था। लेकिन आज ,वही बात  सेकंड से  भी कम समय में हज़ारो से लाखो के बीच पहुंच जाता  है। यदि आपके आवाज(विचार ) दमदार  हो ,तो आपको हीरो बनते देर नहीं लगता। आज , सोशल मीडिया के कारण ,लोगो में सिर्फ जागरूकता ही नहीं बढ़ी है,बल्कि  सोशल मीडिया को अपनी आवाज़ बनाकर समाज में परिवर्तन भी लाया है। सोशल मीडिया ने हमे अपनी तरफ इस-तरह से आकर्षित किया है  ,जैसा मानो हम उसे  बिना  रह ही नहीं सकते। पुरानी मीडिया को भी अपने को जीवित रखने के लिए  सोशल मीडिया का सहारा लेना पड़ा। सोशल मीडिया सिर्फ आज विचार तक ही सिमित नहीं रह गया। आज ये राजनीती में भी उतनी ही भूमिका निभा रही है ,जितना व्यापार जगत में। इसमें कोई दो राय नहीं आनेवाले टाइम में सोशल मीडिया में कई नए फीचर्स देखने को मिल सकता है। जिसे हमारा विचार, समाज में और अधिक मजबूती से फैलेगी।
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एक भारत ,एक परिवार

हिन्दू ,मुस्लिम ,सिख ,ईसाइ   ..... चार धर्मो का देश है हिंदुस्तान। जिन्हे कुछ  नेता या यु कहे कुछ लोग अपने बाप के जागीर समझ बैठे है। ये जो भारत है न ,बहुत ही भोली है यहाँ के जनता, जो एक इशारे पर कुछ करने को तैयार हो जाती है.,कुछ पढ़े लिखे लोग  अपने बात को रखने के लिए इन जनता को को आगे करती है। फिर अपना पैसा और सम्मान बढाती  है। मर जाते है, तो किसी का बाप ,किसी का भाई ,क्या मिलता है मरने के बाद ,पता नहीं। उस गरीब से जाकर पूछो जिसे खाने के लिए रोटी नहीं है ,उस बेरोजगार से जाकर पूछो जिसे नौकरी अगर मिल जाये तो ,उसके नौकरी से कितने लोगो का पेट चलेगा। मजहब ,मस्जिद -मंदिर से इन्हे कुछ लेना -देना नहीं है। लेकिन मूद्दा जो होना चाहिए वो नहीं है ,मुद्दा है तो मंदिर -मस्जिद का। हर धर्म में  अच्छे -बुरे लोग है। किसी धर्म में अच्छाई का प्रितशत ज्यादा है ,तो किसी में बुराई का। न  फातिमा  जिन्दा है , न दुर्गा ,न ही मेरी। जो जिन्दा है उसका तो इज़्ज़त नहीं संभाला जा रहा है यहाँ के लोगो से , जो है ही नहीं  उसका चर्चा बड़े  जोर -शोर से लोगो को सु...

कितना बदल गए है हम

आज भाग -दौड़ भरी जिंदगी में लोग इतने दूर होते जा रहे है कि अपनों के लिए हमे दुसरे के बनाये तकनीक पर आश्रित होना पड़ता है। चाहे माध्यम कोई भी हो। एक समय था जब हम साथ बैठ कर खाते थे। एक दूसरे  का मजाक उड़ाया करते थे। न जाने क्या -क्या कह देते थे ,लेकिन समय के अनुसार ,हम सभी जिम्मेवारी लेते गए, और अपनों  को एक छोटा सा डिब्बा बंद करते  चले गये । जिस डिब्बा का हम सभी एक मोबाइल ,आईफोन और न जाने किस-किस  नाम से जानते है।  लोग कहते है तकनीक जो है अपनों को मिलता है,लेकिन यह सत्य नहीं है। यह हमे और दूर करते जा रहा है अपनों से ,चाहे दोस्त हो या फिर सगे सम्बन्धी। आपको याद है आप सभी दोस्त लास्ट टाइम कब एक साथ खाना खाये थे ? , चलिए यह बातये की आप  सभी परिवार एक साथ कब मिले ?शायद पता नहीं ,अगर पता भी होगा तो एक वक़्त बीत गया होगा।  अगर आज यह तकनीक नहीं होता ,तो शायद यह संभव हो पता। 

कितना फर्क पड़ता है इस दौर के आंदोलन से .........

''आंदोलन ''शब्द का परिभाषा खोजने और जाने की इच्छा हुई ,फिर भारतके अंदर हो रहे है ,आंदोलन को समझने की कोशिश किया। मै जो समझ सका वो यह है कि जब भी समाज के अंदर  शोषण और अन्याय  होता है और इसके खिलाफ में  संगठित रूप से लोगो के द्वारा उठाये गए आवाज़ को ''आंदोलन ''कहते है। लेकिन उस आंदोलन  किस  एक  वयक्ति विशेष  को ही लाभ  मिल पता है। शायद यही कारण आज के माजूदा सरकार  को किसी भी आंदोलन से कोई फर्क नहीं पड़ता।  पिछले कुछ वर्षो  से जो भारत में आंदोलन हुए है ,जो है - १. भारत स्वाभिमान आन्दोलन -2011- ‘भारत स्वाभिमान आन्दोलन’ कालेधन के विरुद्ध खड़ा किया गया एक विशाल जनांदोलन था जिसकी अगुवाई बाबा रामदेव ने किया था।  लेकिन उस समय कांग्रेस की सर्कार थी।  कांग्रेसी सरकार ने पुलिस बल द्वारा इसे जबरन तुडवा दिया। २. जनलोकपाल बिल – एंटी करप्शन आन्दोलन -2011- साल 2011 में ही प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने दिल्ली के जंतर मंतर पर जनलोकपाल बिल के लिए भूख हड़ताल शुरू की, जिसके समर्थन में पूरा देश एकजुट हुआ |   इस...

देश के मुलभुत समस्या से ..दूर सरकार

हमारे प्रधानमंत्री जी ७० साल  को वयवस्था को ५ साल में बदलना चाहते है ,और शायद यही कारण की प्रधानमंत्री जी पुरे देशवासियो ये ३. ५ साल से  सिर्फ गोल -गोल घुमा रहे है  , हम जनता जाना चाहते है.कौन -सा मिशन , ५ साल में इन्होने पूरा कर  दिया या फिर अगले चुनाव के लिए बना रहे है। किसी एक मिशन को ५ साल में १००% न सही ९९% ही कर  देते ।  सिर्फ घोषणा ही हुआ है ,  देश के मुलभुत समस्या है ,अशिक्षा ,गरीबी ,बेरोजगारी,कुपोषण ,भुखमरी .... जिसे आज की  भी सरकार दूर नहीं कर पायी  है। बात हम डिजिटल इंडिया की करते है। जनता जो इन समस्या के लपटे में है उन्ही के वोट से सरकार  बनती है , न कि डिजिटल इंडिया के सपने देखने वाले लोगो से। देश में कुछ लोगो के सुखी रहने से पूरा देशवासियो सुखी कैसे समझ लेती है ,सरकार। वर्तमान सरकार को यह जरूर समझना चाहिए की जीत उनकी वहां से तय होती है  ,जहां  के लोग आज भी  फेसबुक ,ट्विटर नहीं चलना  जानते हैं ,इसलिए इन जगहों पर खर्च करने के बजाये, उन जगह पर खर्च करे, जहां आज भी लोग घर में दीया जलने पर दिवाली और...

देश चलाने का नया राष्ट्रवादी तरीका

1.जब 50 लाख नए रोजगार पैदा करने की जगह हर साल 2 लाख नौकरियाँ खत्म होने की नौबत आ जाये तो जोर जोर से भारत माता की जय,भारत माता की जय चिल्लाना शुरू करें। जनता खुश हो जाएगी और लोगों को एक नया रोजग ार मिल जायेगा। 2.जब 350 करोड़ विदेशी दौरों में खर्च करने के बाद,पैसे देकर मोदी-मोदी चिल्लाने के बाद भी, तीन साल में एक बड़ा विदेशी निवेशक भारत आने को तैयार न हो तो प्रेमी जोड़ों को पकड़कर कूटने लगिये।जनता को लगेगा कि कम से कम सरकार भारतीय संस्कृति को तो बचा रही है। 3.जब आयात घटने लगे,पुराने मित्र देश दुश्मन देश से करीबी बढ़ाने लगें,पर्यटन चौपट होने लगे,विदेशों में भारत की तुलना सूडान और नाइजीरिया से की जाने लगे तो तीन तलाक पर बहस शुरू कर दीजिए।लोगों को लगेगा कि सरकार मुस्लिमों को तो सीधा कर ही देगी,भले और कुछ करे या न करे। 4.जब सरकारी रिपोर्ट कहने लगे कि भ्रष्टाचार 67 फीसदी बढ़ गया तो गाय लेकर जाने वालों को जान से मारना शुरू कर दीजिए।सब समझेंगें ये लोग कम से कम गौ सेवा तो कर ही रहे हैं। 5.जब सैकड़ों करोड़ खर्च करने के बाद भी नदियाँ ज्यों की त्यों रहें तो उनकी परिक्रमा और आरती का आडम्बर शुरू कर दीजिए,...

हम जनता भी क्या करे?

हमारे पास भी कोई नया चेहरा या पार्टी ऐसा नहीं दिख रहा है जो एक साफ सुथरी छवि वाली हो। यह सच की हम जनता कही न कही ठग का शिकार हो रहे है। कभी कोई तो कभी कोई पार्टी हमे मुर्ख बना कर ठग लेती है। इन्ही सबका मजा लेते है हमारे राजनेता , नहीं तो हम भी कब का हंगामा कर  दिए होते इस सिस्टम के खिलाफ , पर हमने किया या देखा भी दिल्ली में, अन्ना आंदोलन  में , लोकपाल बिल के लिए। वहां क्या हुआ ? एक पार्टी वहां  से भी जन्म ले ली और वी भी सत्ता के लालच में इधर -उधर भटकना करना शुरू कर दिया। कभी ये सरकार हमे टार्गेट देती है ,तो कभी हमे राजा बनाने का सपना दिखाती है । नहीं बना ... हमे राजा लेकिन कम से कम ऐसा तो कर  दो जिसे हम दो वक्त का रोटी का जुगाड़ खुद से कर ले ,मुझे आपस में मत लड़ने दो ,हमने बहुत लड़ाई पहले भी की है ,और नतीजा हमने देखा है। क्यों करते हो ,तुम नेता ऐसा ,हमे आपस में तोड़ने के लिए ,सुनो में हम नहीं टुटने वाले ,अब हम लोग  तेज हो गए है। अब हम न तो जातीवाद के लिए ,नहीं आरक्षण के लिए लड़ने वाले क्योकि हमे अब सब समझ आ चूका है। ये टीवी वाले भी खूब करते है मेरा दिमाग ...